उज्जैन में स्वच्छ भारत मिशन कार्यशाला में राजस्थान के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर के.के. गुप्ता बतौर मार्गदर्शक रूप मे संबोधित किया*-
उज्जैन/जयपुर/उदयपुर। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर मध्यप्रदेश शासन द्वारा आयोजित संभाग स्तरीय क्षमता-वर्धन प्रशिक्षण कार्यशाला में बुधवार को राजस्थान सरकार के प्रदेश स्वच्छता ब्रांड एम्बेसडर एवं देश के प्रसिद्ध स्वच्छता विशेषज्ञ के.के. गुप्ता ने मुख्य अतिथि एवं मार्गदर्शक के रूप में जनप्रतिनिधियों, नगर निकायों के अधिकारियों और स्वच्छता प्रभारियों को संबोधित किया। कार्यशाला में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को धरातल पर प्रभावी रूप से लागू करने, वैज्ञानिक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, जनभागीदारी तथा स्वच्छ भारत मिशन को नई गति देने पर विस्तार से चर्चा हुई।
अपने उद्बोधन में के.के. गुप्ता ने कहा कि स्वच्छता केवल सरकारी योजना, कागजी उपलब्धि या नारों का विषय नहीं है, बल्कि यह स्वस्थ समाज, सुरक्षित पर्यावरण और विकसित राष्ट्र की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वच्छता एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर दिए गए निर्देशों का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को स्वच्छ, सुरक्षित एवं स्वस्थ वातावरण उपलब्ध कराना है। यदि इन निर्देशों का ईमानदारी से पालन किया जाए तो देश के सभी शहरों और कस्बों की तस्वीर बदली जा सकती है।
उन्होंने कहा कि जब भी देश में स्वच्छता की चर्चा होती है तो मध्यप्रदेश का इंदौर और राजस्थान का डूंगरपुर प्रेरणादायक उदाहरण के रूप में सामने आते हैं। इन शहरों ने यह सिद्ध किया है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जनभागीदारी और सतत निगरानी के माध्यम से सीमित संसाधनों में भी उत्कृष्ट स्वच्छता व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
के.के. गुप्ता ने कहा कि स्वच्छता केवल शरीर को स्वस्थ रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक शांति, सामाजिक सम्मान, पर्यावरण संरक्षण और दीर्घायु जीवन का आधार भी है। हमने अपने घरों, मंदिरों और धार्मिक स्थलों को तो स्वच्छ एवं पवित्र बना लिया, लेकिन गली, मोहल्ले, बाजार और सार्वजनिक स्थानों की ओर उतना ध्यान नहीं दिया। जबकि वास्तविक स्वच्छता वहीं दिखाई देती है जहाँ आम नागरिक प्रतिदिन जीवन व्यतीत करता है। उन्होंने कहा कि स्वच्छता ऐसा पवित्र कार्य है जो सीधे-सीधे मानव को प्रकृति और ईश्वर से जोड़ता है। इसमें न कोई छोटा है, न बड़ा, न गरीब और न अमीर। अधिकारी, जनप्रतिनिधि, व्यापारी, विद्यार्थी और आमजन—सभी की पहली पसंद स्वच्छ वातावरण ही होता है।
उन्होंने विश्व के उदाहरण देते हुए कहा कि आज पर्यटन भी उन्हीं शहरों और देशों की ओर बढ़ता है जो स्वच्छ और व्यवस्थित हैं। स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों में केवल शहर ही नहीं बल्कि झीलें भी इतनी स्वच्छ हैं कि लोग उनका पानी पीने तक का उपयोग करते हैं। भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ सकता है यदि स्वच्छता को केवल अभियान नहीं बल्कि जीवनशैली बनाया जाए।
*स्वच्छ भारत मिशन की यात्रा का किया उल्लेख*-
के.के. गुप्ता ने कहा कि देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2014 को लालकिले की प्राचीर से स्वच्छ भारत मिशन का आह्वान किया था और 2 अक्टूबर 2014 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर इस ऐतिहासिक अभियान का शुभारंभ हुआ। पिछले एक दशक में इस मिशन ने पूरे देश में स्वच्छता के प्रति व्यापक जनजागरण पैदा किया है, लेकिन अब आवश्यकता इस बात की है कि इसकी शुरुआत प्रत्येक नागरिक अपने घर, गली, मोहल्ले, गांव और शहर से करे। उन्होंने कहा कि हमने मंदिरों और तीर्थस्थलों को तो स्वच्छ बना दिया, लेकिन घरों के बाहर की गलियों, मोहल्लों और नगरों को उसी स्तर पर स्वच्छ नहीं रख पाए। जब तक सार्वजनिक स्थान स्वच्छ नहीं होंगे, तब तक स्वच्छ भारत मिशन का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का संकल्प है कि आजादी के 100 वर्ष पूर्ण होने पर वर्ष 2047 तक भारत विश्वगुरु बने, लेकिन स्वच्छता के बिना विकसित और विश्वगुरु भारत की कल्पना संभव नहीं है। आर्थिक विकास, औद्योगिक प्रगति और आधुनिक आधारभूत संरचना तभी सार्थक होगी जब देश स्वच्छ और स्वस्थ होगा।
*मध्य प्रदेश में "इंदौर" और राजस्थान में "डूंगरपुर" स्वच्छता का प्रेरणादायक उदाहरण है*-
गुप्ता ने कहा कि स्वच्छता केवल सफाई का विषय नहीं, बल्कि नागरिक संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि जब भी देश में स्वच्छता की बात होती है तो मध्यप्रदेश का इंदौर और राजस्थान का डूंगरपुर प्रेरणादायक उदाहरण के रूप में सामने आते हैं। इन शहरों ने जनभागीदारी, प्रशासनिक प्रतिबद्धता और सतत प्रयासों के बल पर स्वच्छता के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।
उन्होंने कहा कि स्वच्छ शहर केवल स्वस्थ नागरिक ही नहीं देते, बल्कि पर्यटन को बढ़ावा देने, निवेश आकर्षित करने और लोगों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने का मजबूत आधार भी बनते हैं। स्वच्छ वातावरण आर्थिक और सामाजिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
गुप्ता ने कहा कि हमने अपने घरों, मंदिरों और निजी परिसरों को तो स्वच्छ रखने की आदत विकसित कर ली है, लेकिन गली-मोहल्लों, बाजारों, सड़कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता को अभी भी उतनी प्राथमिकता नहीं दी जाती। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्थान भी हमारी साझा धरोहर हैं और उनकी स्वच्छता बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का नैतिक एवं सामाजिक दायित्व है।
उन्होंने सभी नागरिकों से आह्वान किया कि स्वच्छता को केवल सरकारी अभियान न मानकर जनआंदोलन के रूप में अपनाएं तथा अपने दैनिक जीवन में स्वच्छता के प्रति जिम्मेदार व्यवहार विकसित करें। तभी स्वच्छ, स्वस्थ और विकसित भारत के लक्ष्य को साकार किया जा सकेगा।
*सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को धरातल पर उतारने के मूल मंत्र*-
स्रोत स्तर पर कचरा पृथक्करण प्रत्येक घर, दुकान एवं संस्थान से गीला, सूखा एवं घरेलू हानिकारक कचरा अलग-अलग संग्रहित किया जाए।
सख्त नियम एवं प्रभावी प्रवर्तन: सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लागू हो तथा सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो।
वेस्ट-टू-वेल्थ मॉडल: कचरे को बोझ नहीं बल्कि संसाधन मानते हुए उससे कम्पोस्ट, ऊर्जा एवं पुनर्चक्रण योग्य सामग्री तैयार की जाए।
जनभागीदारी: स्वच्छता को केवल सरकारी कार्यक्रम न मानकर प्रत्येक नागरिक का व्यवहार और संस्कार बनाया जाए।
*उज्जैन के लिए प्रस्तुत किया विशेष स्वच्छता रोडमैप*-
धार्मिक नगरी उज्जैन में देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को ध्यान में रखते हुए के.के. गुप्ता ने विशेष स्वच्छता मॉडल प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि सीमित संसाधनों में भी वैज्ञानिक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, सतत मॉनिटरिंग और जनसहभागिता के माध्यम से किसी भी शहर को राष्ट्रीय स्तर की 'गार्बेज फ्री' एवं 'स्टार रेटिंग' दिलाई जा सकती है।
*नगर निकायों को दिए व्यवहारिक सुझाव*-
उन्होंने कहा कि प्रत्येक शहर में सुबह 10 बजे से पहले शत-प्रतिशत घर-घर कचरा संग्रहण सुनिश्चित किया जाए तथा प्रत्येक परिवार से स्रोत स्तर पर गीला एवं सूखा कचरा अलग-अलग लिया जाए। इसके लिए व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाया जाए तथा कचरा संग्रहण व्यवस्था की सूक्ष्म मॉनिटरिंग की जाए ताकि कहीं भी कोई कमी न रह जाए। उन्होंने रात्रिकालीन सफाई व्यवस्था को अत्यंत आवश्यक बताते हुए कहा कि प्रत्येक 400 मीटर क्षेत्र में एक सफाईकर्मी की जिम्मेदारी तय हो तथा वाणिज्यिक क्षेत्रों में वर्ष के 365 दिन रात्रि 10 बजे से सुबह 4 बजे तक नियमित नाइट स्वीपिंग हो। साथ ही रात्रि में कार्य करने वाले सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए। सार्वजनिक शौचालयों एवं मूत्रालयों की सफाई पर विशेष बल देते हुए उन्होंने कहा कि इनकी प्रतिदिन कम से कम तीन बार सफाई होनी चाहिए। अधिकारी एवं स्वास्थ्य निरीक्षक स्वयं भी इनका उपयोग कर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करें ताकि सफाई व्यवस्था में निरंतर सुधार हो। विद्यालयों के शौचालयों की नियमित सफाई भी समान रूप से आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि प्लास्टिक थैली पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य एवं पशुओं के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। हमारा लक्ष्य ऐसा होना चाहिए कि शहरों में प्लास्टिक थैली दिखाई ही न दे। इसके लिए उत्पादन, वितरण एवं अवैध व्यापार पर कठोर कार्रवाई की जाए। उन्होंने शहरों के खाली प्लॉटों को गंदगी का सबसे बड़ा स्रोत बताते हुए कहा कि ऐसे भूखंडों के मालिकों को सफाई कराकर चारदीवारी करवाने के लिए बाध्य किया जाए। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो नगर निगम स्वयं कार्य कराए तथा पूरी लागत का दस गुना संबंधित भू-स्वामी से वसूले। आवश्यकता पड़ने पर भूखंड को सीज करने जैसी कार्रवाई भी की जाए।
*मौजूदा चुनौतियों पर भी जताई चिंता*-
के.के. गुप्ता ने कहा कि यदि वर्तमान स्थिति का ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाए तो आज भी अनेक शहरों में डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई स्थानों पर कचरा तो उठाया जा रहा है, लेकिन गीले एवं सूखे कचरे का पृथक्करण नहीं हो रहा तथा शत-प्रतिशत घरों तक संग्रहण व्यवस्था नहीं पहुंच पाई है। परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में कचरा खुले स्थानों पर पड़ा रहता है और गंदगी का वातावरण बनता है। उन्होंने कहा कि सामुदायिक शौचालयों एवं सार्वजनिक मूत्रालयों की स्थिति भी कई स्थानों पर चिंताजनक है। नियमित सफाई नहीं होने से आम नागरिक इनका उपयोग करने से बचते हैं। रात्रिकालीन सफाई भी कई निकायों में केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
उन्होंने कहा कि शहर हो, गांव हो या ढाणी—चारों ओर प्लास्टिक कचरा फैला हुआ दिखाई देता है। शहरों के खाली प्लॉट गंदगी के अड्डे बन चुके हैं, जहां केवल कचरा ही नहीं बल्कि मच्छर, मक्खियां और अन्य हानिकारक जीव-जंतु भी पनप रहे हैं, जिससे आसपास रहने वाले लोग गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं। अनेक स्थानों पर सड़कों पर कचरा फैला रहता है, आवारा पशु घूमते रहते हैं तथा पर्याप्त वृक्षारोपण नहीं होने से पर्यावरण प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इन सभी विषयों पर नगर निकायों को गंभीरता से कार्य करना होगा। यदि इन मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो स्वच्छ भारत मिशन के लक्ष्य अधूरे रह जाएंगे।
*स्वच्छता में राजनीति नहीं, सहभागिता हो*-
के.के. गुप्ता ने स्पष्ट कहा कि स्वच्छ भारत मिशन को किसी भी प्रकार की राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए। यह पूरे देश का अभियान है। नगर निकायों में अधिकारियों के अनावश्यक एवं बार-बार होने वाले स्थानांतरण से योजनाओं की निरंतरता प्रभावित होती है। प्रशासनिक स्थिरता और जवाबदेही दोनों आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि स्थानीय निकायों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र के विकास एवं स्वच्छता संबंधी निर्णय स्वतंत्र रूप से लेने दिए जाने चाहिए। दूसरे क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों द्वारा अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए। प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और नागरिकों के बीच बेहतर समन्वय ही स्वच्छ भारत मिशन की सफलता की वास्तविक कुंजी है।
*प्लास्टिक निर्माता और गंदगी फैलाने वालों पर हो सख्त कार्रवाई*-
अपने संबोधन में के.के. गुप्ता ने कहा कि यदि वास्तव में शहरों को प्लास्टिक मुक्त बनाना है तो केवल आम नागरिकों पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को प्लास्टिक थैलियों का निर्माण, भंडारण और अवैध व्यापार करने वाले निर्माताओं एवं इकाइयों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश जारी करने होंगे। जब तक उत्पादन स्तर पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होगा, तब तक प्लास्टिक पर पूर्ण रोक संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक मुक्त शहर न केवल आमजन के लिए स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण उपलब्ध कराएंगे, बल्कि सड़कों पर घूमने वाले गौवंश एवं अन्य पशुओं के जीवन की रक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, क्योंकि प्लास्टिक उनके स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।
के.के. गुप्ता ने यह भी कहा कि स्वच्छ शहर केवल अपीलों से नहीं, बल्कि प्रभावी कानून और उसके कड़ाई से पालन से बनते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने, कचरा इधर-उधर फेंकने तथा स्वच्छता नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध बिना किसी भेदभाव के सख्त एवं त्वरित दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। जब तक नियमों के उल्लंघन पर दंड का भय नहीं होगा, तब तक शहरों में स्थायी स्वच्छता स्थापित करना कठिन रहेगा। उन्होंने कहा कि जनजागरूकता और दंडात्मक कार्रवाई—दोनों का संतुलित समन्वय ही स्वच्छ भारत मिशन को वास्तविक सफलता दिला सकता है।
रतलाम महापौर ने भी रखे सुझाव
कार्यशाला में नगर निगम रतलाम के महापौर ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि यदि वास्तव में प्लास्टिक थैली के उपयोग पर रोक लगानी है तो केवल उपभोक्ताओं पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। प्लास्टिक थैली का निर्माण करने वाली कंपनियों पर भी प्रभावी नियंत्रण एवं कठोर कार्रवाई आवश्यक है। तभी प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान संभव हो सकेगा l
इस कार्यशाला में मध्य प्रदेश की निकायों के जनप्रतिनिधि एवं अधिकारियों ने भाग लिया तथा फीडबैक फाउंडेशन इस पूरे कार्यक्रम की सूत्रधार रही l
